Saturn Retrograde : जानिए वक्री शनि का सभी भावों में फल

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Astrology

lekhaka-Gajendra sharma

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नई दिल्ली, 21 मई। शनि 23 मई से वक्री होने जा रहे हैं ऐसे में यह जानना जरूरी है किवक्री शनि का अलग-अलग भावों में क्या फल होता है। ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार शनि के वक्री होने पर व्यक्ति को अपनी महत्वाकांक्षाओं एवं असीमित इच्छाओं पर अंकुश लगाना चाहिए। क्योंकिशनि के वक्री काल में व्यक्ति असुरक्षित, अंतर्विरोधी, असंतोषी, अशांत हो जाता है। ऐसे व्यक्ति में आत्मविश्वास की कमी आ जाती है। सर्वशक्तिशाली होते हुए भी व्यक्ति कई गलतियां कर बैठता है, जिस पर उसे बाद में पछताना पड़ता है।

प्रथम भाव में वक्री शनि-शनि यदि प्रथम भाव में वक्री हो तो व्यक्ति समझौते व सुधारवादी विचारों को सिरे से नकार देता है। ऐसे व्यक्ति खुद के विचारों एवं अहम को दूसरों पर जबर्दस्ती थोपना चाहते हैं। अपनी जिद और अहंकारी भाव का त्याग कर दें तो ऐसे व्यक्ति अच्छे इनसान बन सकते हैं। लग्नस्थ वक्री शनि जातक को कुटिल किंतु धनवान बनाता है। ऐसा व्यक्ति राजनीति में अच्छी सफलता पाता है।

द्वितीय भाव में वक्री शनि-द्वितीय भाव का वक्री शनि जातक में असुरक्षा की भावना पैदा करता है। व्यक्ति भौतिक साधनों और शारीरिक सुरक्षा प्राप्त करने के लिए यहां-वहां भागता फिरता है। खर्च भी बिना सोचे-समझे कर देता है। द्वितीयस्थ वक्री शनि जातक को विदेशी कारोबार से लाभ अर्जित करने का अवसर देता है। इनके स्वभाव और वाणी में कटुता रहती है। इससे कई बार मित्र या परिवार नाराज हो जाते हैं।

तृतीय भाव में वक्री शनि-ऐसे जातक अपनी जिम्मेदारियों से हमेशा दूर भागते रहते हैं। भाई-बहनों का कभी सहयोग नहीं करते। स्वयं की शिक्षा और चरित्र निर्माण के प्रति उदासीन होते हैं। बार-बार इन्हें रोग परेशा न करते हैं। ऐसा व्यक्ति जीवन के 25 से 45 की उम्र में मेहनत खूब करता है लेकिन फिर भी अशांत रहता है। गूढ़ विद्याओं में इसकी रुचि होती है। कई मामलों में आर्थिक संकटों से जूझता रहता है।

चतुर्थ भाव में वक्री शनि-चतुर्थ भाव का वक्री शनि जातक को अतिभावुक बनाता है। इसी कारण कई बार यह ठगा जाता है। धुन के पक्के होते हैं। एक बार किसी काम के पीछे पड़ जाएं तो उसे पूरा करके ही दम लेते हैं। चतुर्थ का वक्री शनि जातक को माता और अपने मूल घर परिवार से दूर कर देता है। ऐसे व्यक्ति के जीवन का उत्तरा‌र्द्ध सुखी होता है। पूरे जीवन में जो खोया है वह अंत में पा लेता है।

पंचम भाव में वक्री शनि-पंचमस्थ वक्री शनि जातक को बच्चों के प्रति लापरवाह बनाता है। यह बच्चों की उचित शिक्षा, जरूरतों आदि पर ध्यान नहीं देता फलस्वरूप संतानें भी इन्हें कुछ नहीं मानती। प्रेम के मामले में ये स्वार्थी होते हैं। ये पत्नी या प्रेमिका को केवल शारीरिक उपभोग तक सीमित मानते हैं। इन्हें समाज में भी उचित आदर नहीं मिलता। आर्थिक दृष्टि से ये कमजोर होते हैं। व्यर्थ में धन खर्च करते हैं।

षष्ठम भाव में वक्री शनि-वक्री शनि छठे भाव में हो तो जातक समाजहित का कोई कार्य नहीं करता। ये सामाजिक, पारिवारिक जिम्मेदारियों से बचने का प्रयास करते रहते हैं। स्वयं के स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह होते हैं। शारीरिक रूप से कमजोर होने के कारण इनके शत्रु लाभ उठाने का प्रयास करते हैं। आर्थिक दृष्टि से नुकसान पहुंचाने का प्रयास करते हैं। ऐसे व्यक्ति का ध्यान अपने काम पर कम होता है।

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सप्तम भाव में वक्री शनि-वक्री शनि सप्तम स्थान में होने पर व्यक्ति जीवन के किसी भी क्षेत्र में लंबी भागीदारी नहीं करता। यहां तक किइनका वैवाहिक जीवन भी लंबा नहीं चलता। कारोबार में पार्टनरशिप टूट जाती है। ऐसा व्यक्ति शक्की होता है। यह हमेशा दूसरों के काम में कमी निकालता रहता है। सप्तम का वक्री शनि जीवनसाथी से दूरी बनवाता है। शारीरिक और आर्थिक दृष्टि से जातक कमजोर रहता है।

अष्टम भाव में वक्री शनि-आठवें स्थान का वक्री शनि कुछ मायनों में अच्छा होता है। ऐसा शनि जातक को उच्च कोटि का विद्वान, ज्योतिषी, दार्शनिक बनाता है लेकिन यह अपनी विद्याओं का गलत प्रयोग भी कर जाता है। यह अपनी शक्तियों का प्रयोग करके दूसरों को नुकसान पहुंचाने का प्रयास करता है। इस कारण इसे निंदा का सामना भी करना पड़ता है। कई बार जातक मानसिक रोगी भी हो जाता है।

नवम भाव में वक्री शनि-नवम भाव का वक्री शनि अपनी आर्थिक संपन्नता के प्रति लापरवाह बना रहता है। पुरखों से प्राप्त धन को नष्ट कर देता है। ऐसे जातक संकुचित विचार वाले होते हैं। आर्थिक और धार्मिक दृष्टि से समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यदि अपने विचारों को सही दिशा में लगाएं तो श्रेष्ठता के शिखर पर विराजमान हो सकते हैं। समाजसेवा के कार्य करें तो दुनिया में नाम हो सकता है।

दशम भाव में वक्री शनि-दशम स्थान में वक्री शनि वाला जातक अपने अधिकार का दुरुपयोग करता है। इसमें अपने कार्य के प्रदर्शन की प्रवृत्ति होती है। हालांकिकई मामलों में निरुत्साहित और ठंडे स्वभाव के होते हैं। आर्थिक दृष्टि से संपन्न होते हुए भी दूसरों की मदद नहीं करते हैं। जीवन का उत्तरा‌र्द्ध रोगों और उन पर खर्च में व्यतीत होता है। पारिवारिक जीवन सामान्य रहता है।

एकादश भाव में वक्री शनि-एकादश भाव का वक्री शनि जातक को अपने रिश्तेदारों, संबंधियों एवं मित्रों के साथ कभी ठीक व्यवहार नहीं करता है। यह हमेशा अपने से र्निम्न वर्ग के लोगों के साथ दोस्ती रखता है और उनसे प्रशंसा पाकर स्वयं को महान समझने की भूल कर बैठता है। इसे खुद की चापलूसी करवाना पसंद होता है। यह अपनी पति-पत्नी और बच्चों का पूरी तरह ध्यान नहीं रखता।

द्वादश भाव में वक्री शनि-द्वादश भाव का वक्री शनि जातक को अंतर्मुखी बनाता है। यह आलसी और लापरवाह स्वभाव का होता है। कार्यो को टालने की प्रवृत्ति के कारण नुकसान भी उठाना पड़ता है। ऐसा जातक अपने से कमतर लोगों से दोस्ती करता है और अंधे में काना राजा की तरह व्यवहार करता है। इसे हमेशा अपने शत्रुओं से पराजित होने का डर बना रहता है और हमेशा पैसों का नुकसान कर बैठता है।

English summary

Saturn Retrograde on May 23, how to find out the zodiac sign of your Shani.



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